समय के साथ इस प्रतिस्पर्धी दुनिया में हम सब कभी ना कभी दुख, निराशा और चिंता का सामना तो करते ही हैं, लेकिन यही दशा अगर दिनचर्या का आधार बन जाये तो क्या उसे अवसाद का नाम देना सही है? और अगर हाँ तो वह क्या,कैसे, कब और किन सब को होता है?क्या इससे बचा जा सकता है?

क्या उदास होना अवसाद के करीब जाना है?

आखिर क्या है अवसाद?

अवसाद या डिप्रेशन का तात्पर्य मनोविज्ञान के क्षेत्र में मनोभावों संबंधी दुख से होता है। इसे रोग या सिंड्रोम की संज्ञा दी जाती है।

डिप्रेशन की अवस्था में व्यक्ति स्वयं को लाचार और निराश महसूस करता है। उस व्यक्ति-विशेष के लिए सुख, शांति, सफलता, खुशी यहाँ तक कि रिश्ते भी बेमानी हो जाते हैं। संबंधों में बेईमानी का परिचायक उसके द्वारा उग्र स्वभाव, गाली गलौज व अत्यधिक शंका करना इसमें शामिल होता है, इस दौरान उसे सर्वत्र निराशा, तनाव, अशांति, अरुचि प्रतीत होती है |

 

कारणों और लक्षणों से सचेत

 

इसके भौतिक कारण भी अनेक होते हैं। इनमें कुपोषण, आनुवंशिकता, हार्मोन, मौसम, तनाव, बीमारी, नशा, अप्रिय स्थितियों में लंबे समय तक रहना आदि प्रमुख हैं।

यह मूलतः किसी व्यक्ति की सोच की बनावट या उनके व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। अवसाद लाइलाज रोग नहीं है। इसके पीछे जैविक, आनुवांशिक और मनोसामाजिक कारण होते हैं।

अवसाद एक मानसिक स्वास्थ्य विकार होता है जो कुछ दिनों की समस्या न होकर एक लम्बी बीमारी होती है | विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह दुनिया भर में होने वाली सबसे सामान्य बीमारी होती है | यही नहीं इसकी अधिकता के कारण रोगी आत्महत्या तक कर सकते हैं।

लक्षण

  • अवसाद से ग्रस्त व्यक्ति हमेशा उदास रहता है

  • व्यक्ति हमेशा स्वयं उलझन में, एवं हारा हुआ महसूस करता हैं 

  • उस व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी होती है 

  • किस भी कार्य में ध्यान केंद्रित करने में परेशानी होती है

  • हमेशा चिड़चिड़ा रहता है तथा बहुत कम बोलता है

  • रोगी में बहुत अधिक गुस्सा आने की भी समस्या देखी जाती है

  • व्यक्ति काफी संवेदनशील महसूस करता हैं 

  • हर समय कुछ बुरा होने की आशंका से घिरा रहता है आदि|

उपचार

  • अवसाद में योगासन में प्राणायाम बहुत सहायक सिद्ध हुआ है। 

  • कई बार अतिरिक्त चिड़चिड़ापन, अहंकार, कटुता या आक्रामकता अथवा नास्तिकता ज्यादा होने पर जरूरी है कि हम किसी मनोचिकित्सक से संपर्क करें।

  • व्यक्ति को खुशहाल वातावरण दें।

  • उसे अकेला न छोड़ें तथा छिन्द्रान्वेषण कतई न करें।

  • उसकी रुचियों को प्रोत्साहित कर, उसमें आत्मविश्वास जगाएं और कारण जानने का प्रयत्न करें।

  • सकारात्मक सोच उनके दिमाग में रखना चाहिए “जो होगा अच्छा होगा”।

जिंदगी की कशमकश में युवा

युवावस्था को जीवन का सबसे बेहतर समय माना जाता है। यह वह समय होता है जब व्यक्ति अपने भविष्य के निर्माण के लिए प्रयास करता है। लेकिन, वर्तमान में यह अवस्था अवसाद जैसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त होती जा रही है। प्रतिस्पर्धा और कई प्रकार के मानसिक दबाव को इस बीमारी का सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है।

 

प्रतिवर्ष अस्पताल में मानसिक तनाव के मरीजों का आंकड़ा बढ़ रहा है,लेकिन उनके परिजन इस बात को समाज के सामने रखने से कतराते हैं। डॉक्टरों ने बताया कि ज्यादातर रोगी के परिजन मामला पूरा बिगडऩे के बाद ही डॉक्टर की सलाह लेते हैं। इससे पहले वह अंधविश्वास के चलते विभिन्न देवताओं के थान पर ही जाना सही मानते हैं|

समझें और समझाएं

थोड़ी सी भी उदासी होने के बाद अक्सर लोग खुद को अवसाद में समझने लगते हैं। ब्रेकअप हुआ तो अवसाद, ऑफिस में कोई दिक्कत हुई तो अवसाद या कोई अन्य पारिवारिक। हर चीज को अवसाद से जोड़कर देखना सही नहीं होता है।

दरअसल, अवसाद और उदासी में अंतर होता है। अवसाद की शुरुआत भले ही उदासी से हो सकती है लेकिन, इसमें कई बड़े अंतर होते है |

जैसे की उदासी हमेशा नहीं बनी होती ऐसी कई मौके आते हैं जब आप उदासी को भूल कर खुश हो जाते हैं | वहीं दूसरी तरफ अवसाद में आप बेहद उदास, खोया हुआ, नाखुश  महसूस करते हैं यह दिन और रात के हिसाब से नहीं बदलते |

इसलिए किसी को सलाह देने से पहले आप भी अवसाद और उदासी में अंतर को समझें और बढ़ती समस्या से अपनों को बचा ले |

 

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