कहानी दो दोस्त,

उनकी चुस्कियां और चाय की,

सही कहूं तो उनकी

नॉट सो इम्पोर्टेन्ट राय की!

 

बैठे थे बाजू के आंगन 

लेकिन दो हाथ दूर-दूर 

ठहाके लगाए ,

कर रहे थे बातें भरपूर

उन्हें सुनकर हो रहा था दर्द ,

पर उन्हें मुझे सुनना था ज़रूर। 

 

दोनों शायद थे 45 पार,

गलियां दे रहे थे किसीको हज़ार !

 

उनके हाथ बड़े गुस्से से हिल रहे थे,

दोनों के ख्याल जाकर 

एक ही मोड़ पर मिल रहे थे।

 

इधर मेरा खून खौल रहा था,

न जाने मन ही मन, मैं 

कितना कुछ बोल रहा था !

 

मैंने अपने आप को संभाला ,

खुदको माहौल के हिसाब से ढाला !

 

की तभी एक महाशय बोले ,

अरे यह वायरस क्या कहर है !

तभी दूसरे बोले,

वायरस से ज़्यादा यह वाइरल ज़हर है!

 

“वाइरल” मैंने तो कोविद सुना था ,

वो मुस्कुराकर बोले,

तू बेवकूफ है मैंने बोला था।  

 

फ़ोन आगे बढ़ाकर , 

देखने को बोले न्यूज़,

whatsapp यूनिवर्सिटी के दो छात्रों

को देखर मेरा उड़ गया fuse!

 

तभी उठाकर शब्दों की 

तलवार और ढाल,

बत्तीसी निकाल आवाज़ दी ,

और अंकल क्या हाल चाल !

मैं पूछा क्या बातें हो रही है।  

उन्हें क्या पता था 

अंदर मेरी आत्मा रो रही है। 

 

वो भी खिलखिलाती हंसी के साथ बोले 

यह सब पॉलिटिक्स हैं तुम दूर रहो। 

बड़े अच्छे शब्दों में समझाया की 

आज कल यही होता है,

मजबूर रहो!

 

मैंने जवाब में सांस भरी ही थी,

मुझे पता था मेरी तरफ की घास हरी ही थी !

पर तभी माँ ने चिल्लाया,

बेटा चाय तैयार हैं !

मैं भी बोला छोड़ो ,

आज रविवार है !