बाल श्रम एक बड़ा मुद्दा हैं भारत के कल, आज और आनेवाले कल का, जो अब और भी ज्वलंत समस्या बनता जा रहा है । 

 बाल श्रम! शब्द बहुत जाना पहचाना सा लगता है ना! आखिर हो भी क्यों ना हमने अपने ज़िन्‍दगी में ऐसे किसी ना किसी बच्चे को अवश्य देखा होगा जो बाल श्रम से पीड़ित होगा।

ILO और UNICEF के द्वारा दी गई बाल श्रम पर परिभाषाएँ 

बाल श्रम ने बच्चों का बचपन छीन लिया है। जिस उम्र में बच्चों को खेलना कूदना, पढ़ना लिखना चाहिए उस आयु में बच्चों को मजबूरन बाल श्रम करना पड़ रहा है । अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) में बाल श्रम को सबसे अच्छी तरह से परिभाषित किया है, वो कार्य जो बच्चों को उनके बचपन, उनकी क्षमता और उनकी गरिमा से वंचित करता है, और शारीरिक और मानसिक विकास के लिए हानिकारक है। उन्हें स्कूली शिक्षा को ग्रहण करने से वंचित रखता है; उन्हें समय से पहले स्कुल छोड़ने के लिए बाध्य करता है । 

UNICEF ने बाल श्रम को अलग तरीके से दर्शाया है ।UNICEF के मुताबिक वह बच्चे जो 5 से 11 वर्ष की आयु के बीच है और एक सप्ताह में कम से कम एक घंटे की आर्थिक गतिविधि या कम से कम 28 घंटे का घरेलु काम किया है वे सभी बच्चे बाल श्रमिक है और 12 और  14 वर्ष की आयु के बच्चे जिन्होंने प्रति सप्ताह कम से कम 14 घंटे की आर्थिक गतिविधि या कम से कम 42 घंटे की आर्थिक गतिविधि और घरेलू कार्य किया है वे सब बाल श्रमिकों में गिने जाते है। 

भारत में बाल श्रम 

जब भी भारत का उल्लेख किया जाता है तो सबसे पहला विचार आपके मन मे क्या आता है? भारतीय संस्कृति, स्वादिष्ट व्यंजन,  भाषा शैली, पर्यावरण की खूबसूरती? या फिर आप शायद बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता प्रदूषण और भारत के कई लोगों द्वारा गरीबी की समस्या का सामना कैसे किया जा रहा है उसके के बारे में सोचते होंगे।  भारत के ये सभी महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक हैं बाल श्रम! आप को ये जानकर आश्चर्य होगा कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, भारत में बाल श्रमिकों की संख्या 1.01 करोड़ है, जिसमें 56 लाख लड़के और 45 लाख लड़कियां हैं।

भारत में बाल श्रम के कारण 

पिछले कुछ वर्षों में बाल श्रम का दर गिरा है, मगर फिर भी बच्चों का उपयोग कुछ गंभीर गतिविधियों के लिए किया जाता है जैसे बंधुआ मज़दूरी, बाल सैनिकों और तस्करी आदि । UNICEF का सुझाव है की बाल श्रम का सबसे बड़ा कारण गरीबी है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO)  का सुझाव है की गरीबी बच्चो को कार्यस्थल पर ले जाने वाली सबसे बड़ी शक्ति है। कुछ परिवारों के लिए उनके बच्चों की आय से ही घर चलता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के 2008 के अध्ययन में पाया गया कि स्कूली शिक्षा की उपलब्धता और गुणवत्ता की कमी भी बच्चों को हानिकारक श्रम की ओर ले जाती है।  

 ग्रामीण क्षेत्रों में ये समस्याएं ज़्यादा दिखाई देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में या तो स्कूल नहीं होते है और होते है तो काफी दूर होते है जिसकी वजह से स्कूल जाने में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यद्यपि यूनिसेफ द्वारा प्रकाशित एक पुरानी रिपोर्ट आईएलओ रिपोर्ट द्वारा संक्षेपित मुद्दों की रूपरेखा तैयार करती है। यूनिसेफ की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में 90% बाल श्रम इसके ग्रामीण क्षेत्रों में है, स्कूलों की उपलब्धता और गुणवत्ता खराब है। 

भारत में बाल श्रम से जुड़े कानून 

  • भारत में बाल श्रम को ध्यान में रखते हुए कानून बनाने में आया हैं , जिसे बाल श्रम संशोधन (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 2016 के तौर पर जाना जाता हैं। यह कानून बाल मज़दूरी को नियंत्रित करता हैं और साथ ही साथ ये कहता हैं कि 14साल से कम उम्र के बच्चों को चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में और इसके अलावा फैमिली बिज़नेस को छोड़कर और किसी भी क्षेत्र में काम करने की इजाज़त नहीं देता।
  • साथ ही साथ संविधान के तहत राज्यों को ध्यान रखना है ही 14 वर्ष तक सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा भी प्रदान करना अति आवश्यक हैं।
  • 2001 से सर्व शिक्षा अभियान सरकार द्वारा चलाई गई मुहिम थी जिसमें राज्यों में गरीब और नियोजित बच्चों को शिक्षित करने की बड़ी पहल की थी
  • 1988 से केंद्र सरकार द्वारा राज्यों में राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजनाओं को गैर-औपचारिक शिक्षा और पूर्व व्यावसायिक कौशल प्रदान करने के लिए लागू किया गया हैं। (बाल श्रम कानून)

वास्तविकता 

कानूनों को लागू कर सरकार प्रयास तो कर रही है कि बाल श्रम को खत्म  किया जाए । पर उसी के साथ ये जिम्मेदारी देश के नागरिकों की भी है। ऐसा कुछ होने पर तमाशा देखने से बेहतर है की उन बच्चों को बाल श्रम के  दलदल में जाने से बचाया जा सके। किसी का साहस किसी की ज़िन्‍दगी बचा सकता है। तमाशा देखने वाले बहुत है, अब इस तमाशे को ही बंद करो! सोच बदलो तो शायद किसी की ज़िन्‍दगी बदलेगी!

लेखिकाएं : साक्षी एवं नंदिनी