LGBTQ+ ऐक्टिविस्ट व भारत के पहले समलैंगिक प्रिन्स मानवेंद्र सिंह गोहिल के साथ बातचीत

 

कामसूत्र हमारे देश में लिखा गया है , इससे दूर जाने के बजाय इसे समझे और अपनाए ” 

 

देश में जहाँ एक ओर ऐसा कहा जाता है की विवाह दो दिलो का सम्बंध होता है पर ना जाने क्यूँ लिंग  के आधार पर इसे बाँट दिया जाता है जहाँ एक ओर हम समानता की बात करते है वही दूसरी ओर LGBTQ+ समुदाय आज भी इसी समानता के लिए संघर्ष कर रहा है | जहाँ एक ओर आम इंसान को स्वयं को LGBTQ+ समुदाय को अपनाने के साथ ही घृणा भरी निगाहों से देखा जाता है   तो क्या आपने कभी सोचा है की अगर किसी राजघराने के राजकुमार ने जब स्वयं को समलैंगिक बताया होगा तो उसके साथ कैसा बर्ताव हुआ होगा ? जी हाँ ,हम   बात कर रहे है गुजरात के राजपीपला के राजकुमार , विश्व के प्रथम समलैंगिक प्रिन्स और लक्ष्य ट्रस्ट के संस्थापक श्री मानवेंद्र सिंह गोहिल की 

प्रश्न: शुरुआत में जब आपने अपने अपने माता पिता को अपने समलैंगिक होने की बात के बारे में  बताया तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी ?

जवाब : मातापिता ने बिलकुल मानने से इंकार कर दिया उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ अशोक राव कवि जो देश के पहले समलैंगिक एक्टिविस्ट थे वो मेरे पास में ही रहते थे उन्होंने मुझे बताया की मैं  सामान्य हूँ किंतु मेरे मातापिता ने ऐसी अफ़वाह फैला दी की अशोक राव कवि ने अपने स्वार्थ के लिए मुझे समलैंगिक बना दिया कोई भी अपने जन्म से होता हैं उसे बनाया नहीं जा सकता काफ़ी महेनत की थी उन्हे मनाने की पर वो माने अपने मातापिता के मुँह से सुना था की उच्च जाति के लोग समलैंगिक नही होते लेकिन ये बात गलत हैं ये साबित करने के लिए मैंने सबको मेरे बारे में बता दियाये सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है, की लोग संस्कार के साथ समलैंगिक होने या होने को जोड़ते हैं दरअसल यह  संस्कार नहीं मन के भावों  की बात है  

प्रश्न: परिवार या समाज को समझना कितना ज़रूरी हैं LGBTQ+ समुदाय  के बारे जानने में और इस कम्युनिटी को स्वीकार करने में?

जवाब : जो लोग भी हमारे ख़िलाफ़ उँगली उठाते हैं, मैं इसमें ना ही परिवार ही समाज को दोष दूँगा लेकिन दोष दूँगा उनकी अज्ञानता को इतना ज़रूर बताना चाहूँगा की भारत के पास बहुत बड़ी धरोहर के तौर में एक किताब हैं जिसका नाम हैंकामसूत्र लेकिन इसे ही कोई पढ़ना चाहता हैं ही समझना इसी कारण से लोगो में LGBTQ+ समुदाय  के बारे अज्ञानता हैं क्योंकि सेक्स ऐज्युकेशन के बारे में हमारे देश पढ़ाया जाता हैं इसीलिए लोग सुनीसुनाई बातों को फैलाते हैं और इसमें उनकी अज्ञानता झलकती हैं हमें गर्व होना चाहिए अपने भारतीय होने पर की हमारे देश के किताबों में ज्ञान का भंडार भरा पड़ा हैं लेकिन अंग्रेजों की गुलामी छोड़कर भी आज हम अंग्रेजो के कानून को अपना रहे हैं क्यों नहीं हम अपने अलग कानून बनाये और न्याय प्रदान करे हम तो हमारी संस्कृति को लेकर खड़े हैं हमकामसूत्रको पढ़ते हैं, ‘ खजूराहोको सलाम करते हैं हम पर व्यंग्य करने वाले पश्चिमी संस्कृति को अपना रहे हैं

प्रश्न: कार्यस्थल की बात की जाए तो एक LGBTQ+ के व्यक्ति  को क्या परेशानियों और भेदभाव का सामना करना पड़ता है ?

जवाब: कार्यस्थल पर LGBTQ+ के समुदाय के व्यक्ति  को प्रमोशन में सबसे ज़्यादा परेशानियों का सामना करना होता है क्यूँकि यही कहकर उन्हें प्रमोशन नहीं दिया जाता की आपका परिवार नहीं है तो आपको इसकी क्या आवश्यकता ? वही दूसरी ओर हमारे मानवाधिकारों  का भी कही ना कही उल्लंघन होता है सच्चाई को अपनाने के बजाय वो  कहासुनी और ग़ैरमान्यताओ को मान कर हमारे साथ भेदभाव किया जाता है 

प्रश्न: बॉलीवुड और मीडिया की LGBTQ+ समुदाय के लिए क्या भूमिका है ? 

जवाब : कही ना कही नयी पीढ़ी बॉलीवुड स्टार से प्रभावित हो कर उसी बात को अपनाती है तो देखा जाए तो वक्त के साथ बॉलीवुड भी LGBTQ+ समुदाय को सकारात्मकता के साथ प्रदर्शित करते है और मीडिया भी अब LGBTQ+ के हित में ही खबरों का प्रसार कर लोगों की मानसिकता को बदल रहा है

प्रश्न : धारा 377 के हटने के  बाद LGBTQ+  समुदाय की ज़िंदगी में क्या क्या परिवर्तन आए है ?

जवाब : बेशक इसके बाद कई सारे परिवर्तन आए है परंतु अभी भी ऐसा नहीं कहा जा सकता की हमें समान अधिकार और दर्जा समाज में मिल पा रहा है  

प्रश्न: आप क्या संदेश देना चाहेंगे उन युवाओं को जो स्वयं को अपनाने से हिचकिचाते है ?

जवाब: आप जो भी है उसपर गर्व कीजिए ,स्वयं को अपनाए , इसके बाद सब दरवाज़े धीरे धीरे खुलते  जाएंगे