Poem

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मज़हब “
तेरा आना यहां तय था,
नहीं दिया तुझे किसी मज़हब ने,
खुदा तेरा कोई और है,
जिसने दिया तुझे जन्म है। भावनाओं का खून कर देते हो,
सपनों को चूर कर देते हो,
ज़हन को चीर फाड़कर,
तुम हूबहू कर देते हो। उसको प्रसन्न कर जनेको दुनिया पूरी लुटाते हो,
चादर से और उठ जाते हो,
तुम तुमको फना कर देते हो! मज़हब की बेडियां तोड़ो अब,
मिट्टी में यही मिलना तुमको,
उसके दर पे सब है एक,
चाहे राम या रहीम तुम!
मज़हब – ए – प्यार बढ़ाना था,
इस जहां को और प्यारा बनाना था,
नहीं दिया तुझे किसी मज़हब ने,
खुदा तेरा कोई और है! 
-Vidhi Shukla
 

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