एक इल्तज़ा मोहब्बत की

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कुछ पल मिले थे ख़ुशी

से जीने को,

वो भी ले लिया तूने

ओ ख़ुदा।

 

अभी तो हुआ था मोहब्बत

का आगाज़ ,

तूने तो उसका अंजाम दे

दिया।

 

अभी तो नापी थी उनकी

आँखों की गहराई को ,

ज़रा और डूबने तो देते

हमको।

 

अभी तो उलझे थे उसकी

लहराती ज़ुल्फ़ों में ,

ज़रा सुलझाने तो देते उसे

हमे।

 

आखिर बोले “मुसाफिर”

उठना।

मोहब्बत न दी उसका  ग़म

नहीं ऐ खुदा ,

लेकिन ज़रा जीने की वजह

तो देते हमे।

 

रास्ता न दिखा मुझ

“मुसाफिर” को ,

लेकिन ज़रा मंज़िल तो बता

मुझको।

Akash Vasava

[email protected]

 

 

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